Shilpi murder case
शीर्षक
“साधु यादव पर गंभीर आरोप: शिल्पी का गैंगरेप और मर्डर, CBI को ब्लड सैंपल देने से किया था इनकार”
बिहार की राजनीति और अपराध की काली किताब में दर्ज शिल्पी-गौतम कांड आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय है। यह वह केस है जिसने सत्ता, पुलिस और अपराध के रिश्तों की पोल खोल दी थी।
3 जुलाई 1999 की रात पटना के फ़्रेज़र रोड पर कार से शिल्पी जैन और गौतम सिंह के शव बरामद हुए। शुरुआत में पुलिस ने इसे डबल सुसाइड करार देकर मामला रफा-दफा करने की कोशिश की, लेकिन धीरे-धीरे इसमें बड़े नेताओं के नाम सामने आने लगे।
साधु यादव पर सीधे आरोप
मीडिया रिपोर्ट्स और पीड़ित परिवारों के आरोपों के मुताबिक, साधु यादव (लालू यादव के साले) का नाम इस पूरे कांड में बार-बार सामने आया।दावा किया गया कि शिल्पी का गैंगरेप कर हत्या कर दी गई और पूरे केस को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश हुई।
सबसे बड़ा विवाद उस वक्त हुआ जब CBI ने साधु यादव से ब्लड सैंपल माँगा, लेकिन उन्होंने साफ तौर पर देने से इनकार कर दिया।
इससे शक और गहरा हो गया कि आखिर एक निर्दोष व्यक्ति अपने खून का सैंपल देने से क्यों बचेगा?
जांच में ढील और राजनीति का दबाव पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शिल्पी के शरीर से वीर्य (semen evidence) मिलने की पुष्टि हुई थी, लेकिन इस पर गंभीरता से कार्रवाई नहीं हुई।गौतम का शव परिजनों को बताए बिना ही उसी रात जल्दबाज़ी में जला दिया गया।
सबूतों को सही तरह से सुरक्षित नहीं रखा गया, जिससे पूरी जांच संदिग्ध बन गई।
अंततः 2003 में CBI ने इस केस को “डबल सुसाइड” बताकर बंद कर दिया, लेकिन जनता आज भी मानती है कि यह साफ-साफ हत्या और गैंगरेप का मामला था।
आज भी उठते हैं सवाल
क्या राजनीतिक दबाव में जांच एजेंसियों ने केस को दबा दिया?
क्या साधु यादव जैसे प्रभावशाली नेताओं को बचाने के लिए “सुसाइड थ्योरी” गढ़ी गई?
25 साल बाद भी यह केस बिहार की राजनीति और अपराध की गहरी सच्चाई बयां करता है।
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